रिपोर्ट : विद्यानंद
देवरिया : उत्तर प्रदेश में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के प्रस्तावित समायोजन (विलय) के खिलाफ लोकमोर्चा के तत्वावधान में राष्ट्रीय समानता दल, राष्ट्रीय महिला भीम आर्मी और विभिन्न संगठनों ने महामहिम राज्यपाल को पत्र लिखकर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। संगठनों ने इसे शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम की भावना के खिलाफ बताया और कहा कि इससे गरीब, दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
पत्र में कहा गया कि देश की बड़ी आबादी की दैनिक आय 100-200 रुपये के बीच है, जो निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा वहन नहीं कर सकती। सरकारी स्कूल ग्रामीण और गरीब बच्चों के लिए शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम हैं। लेकिन, कम नामांकन के बहाने इन्हें बंद करने या आंगनवाड़ी में बदलने की योजना बनाई जा रही है। 2023-24 में उत्तर प्रदेश में 21.83 से 22.8 लाख छात्रों की संख्या घटी है और 27,931 स्कूलों में छात्र संख्या 50 से कम है। पहले चरण में 19,000 से अधिक स्कूलों को बंद करने की योजना है, जिसे संगठनों ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के बजाय स्कूल समाप्त करने का प्रयास करार दिया।
शिक्षक संघों और विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों की खराब स्थिति, जर्जर ढांचा, और योग्य शिक्षकों की कमी इसके लिए जिम्मेदार है। पत्र में मांग की गई है कि स्कूलों को बंद करने के बजाय बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं, योग्य और स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति हो, और सरकारी स्कूलों को आवासीय बनाया जाए। मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने स्कूलों को रसोईघर में बदल दिया, जबकि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझाया गया, जिससे पढ़ाई प्रभावित हुई।
संगठनों ने चेतावनी दी कि स्कूलों के विलय से ड्रॉप-आउट दर बढ़ेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच सीमित होगी, जिससे लोकतंत्र की नींव भी कमजोर होगी। उन्होंने सरकार से स्कूलों को मजबूत करने और शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने की नीति अपनाने का आग्रह किया।
**मांगें:**
1. सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के विलय पर तत्काल रोक।
2. सरकारी स्कूलों को आवासीय बनाया जाए।
3. योग्य और स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए।
यह मुद्दा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और ग्रामीण भारत की बेहतरी के लिए सरकार के अगले कदमों पर सबकी नजरें टिकी हैं।
